देवबंद केवल एक धार्मिक कस्बा भर नहीं है, बल्कि उपमहाद्वीप में एक प्रभावशाली वैचारिक धारा का केंद्र रहा है। यहीं से तबलीगी जमात और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाएँ निकलीं, जिन्होंने दक्षिण एशियाई मुस्लिम समाज के धार्मिक-राजनीतिक ढाँचे को गहराई से प्रभावित किया।
जमीयत के एक गुट ने ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई थी। विडंबना यह है कि आज भी भारतीय देवबंद में उन उलेमा को भी आदर्श माना जाता है जिन्होंने पाकिस्तान की नींव रखने में योगदान दिया था।
तालिबान और देवबंदी विचारधारा का संबंध
तालिबान की वैचारिकी दरअसल देवबंदी-हनफ़ी परंपरा का एक उग्र रूप है। यह धार्मिक राष्ट्र के नाम पर सामंती और कठोर इस्लामी शासन की आकांक्षा रखता है। तालिबान की संरचना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जातीय और सांस्कृतिक वर्चस्व पर भी आधारित है। यह मुख्य रूप से पश्तून प्रभुत्व वाला संगठन है, जो हज़ारा, ताजिक, उज़्बेक और बलोच समुदायों को अपने से कमतर समझता है। यही कारण है कि उसे अफ़ग़ानिस्तान की संपूर्ण जनता का समर्थन कभी नहीं मिल पाया।
उत्तरी गठबंधन के नेता अमरुल्ला सालेह और अन्य गैर-पश्तून समूह हमेशा से इसके विरोध में रहे हैं। तालिबान की दृष्टि में अफ़ग़ानिस्तान वस्तुतः “पख्तूनिस्तान” है — जिसने देश को नस्लीय आधार पर बाँट दिया। इस प्रकार तालिबान इस्लामी एकता नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन का प्रतीक बन गया।
जैसे ईरान सैय्यद शिया विचारधारा का और सऊदी अरब वहाबी विचारधारा का केंद्र माने जाते हैं, वैसे ही अफ़ग़ानिस्तान आज देवबंदी कट्टरपंथ का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।
भारतीय मुस्लिम समाज में सत्ता-संरचना
भारतीय मुस्लिम समाज में लंबे समय से अशराफ नेतृत्व (सामाजिक रूप से ऊँची मानी जाने वाली जातियों का प्रभुत्व) धार्मिक और राजनीतिक मंचों पर हावी रहा है। इसमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड जैसी संस्थाएँ प्रमुख हैं।
इन संस्थाओं की प्राथमिकता कभी भी पसमांदा (दलित, पिछड़े और आदिवासी मुसलमान) के मुद्दे नहीं रहे। शिक्षा, रोज़गार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मूलभूत प्रश्न आज भी इनके विमर्श से बाहर हैं।
जब पसमांदा समाज सामाजिक न्याय की बात करता है, तो यही नेतृत्व “मुस्लिम एकता” और “इस्लाम ख़तरे में है” जैसे नारों के सहारे उनकी आवाज़ को हाशिये पर धकेल देता है।
वैचारिक संवाद और राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा
आज ज़रूरत इस बात की है कि पसमांदा समाज यह समझे कि तालिबान जैसी विचारधाराएँ दरअसल अशराफ सत्ता-संरचना को ही मज़बूत करती हैं — यह उनके हितों की रक्षा नहीं करतीं। भारत और तालिबान के बीच जो भी संवाद है, वह केवल कूटनीतिक है, वैचारिक नहीं।
इसलिए उन अशराफ तत्वों को पहचानना आवश्यक है जो इस संवाद का राजनीतिक दुरुपयोग कर, पसमांदा की आवाज़ को फिर से दबाने का प्रयास कर सकते हैं।
🖋️ लेखक:डॉ फैयाज अहमद फैजी ।अनुवादक, स्तंभकार, मीडिया पैनलिस्ट, पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता एवं आयुष चिकित्सक













