पितृ पक्ष हर साल आश्विन महीने में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ हो जाता है और पितृपक्ष का समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर पर होता है। इस साल पितृ पक्ष का आरंभ 7 सितंबर से हुआ है। आइए जानते हैं पितृ पक्ष का महत्व और पितृ पक्ष से संबंधित तमाम छोटी बड़ी जानकारी विस्तार पूर्वक।
हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि मृत्युलोक और स्वर्ग लोक के बीच में एक अन्य लोक भी है जो पितृलोक कहलाता है। माना जाता है कि यह स्थान चंद्रमा के पृष्ठ भाग में स्थित है। जो लोग मृत्यु लोक में अपना जीवन पूरा करके देह त्याग करते हैं वह पितरों के लोक में जाते हैं। जैसे स्वर्ग के राजा इंद्र हैं वैसे ही पितृलोक के राजा आर्यमा हैं और इन्हें ही प्रधान पितृ माना जाता है।
कहते हैं कि, पितृलोक में उन आत्माओं को भी स्थान मिलता है जो किसी कारण से अपना जीवन पूरा किए बिना किसी दुर्घटना की वजह से देह त्याग करके चले जाते है। जब पितृपक्ष आता है तब पितृलोक से अन्य लोकों में स्थित पितरों यानी पूर्वजों की आत्मा को वापस मृत्युलोक में अपने परिजनों के पास 15 दिनों तक रहने का अवसर मिलता है।
गरुड़ पुराण, कठोपनिषद सहित अनेक ग्रंथों में वर्णित है कि, पितृपक्ष में पितरों की आत्मा जब धरती पर आती है तो यह अपने वंशजों और संतानों से बहुत उम्मीद और आस लगाए रहते हैं कि इनके पुत्र और संतान इन्हें जल देंगे, और अन्न से पिंडदान करेंगे। कहते हैं कि पितृपक्ष में जो अन्न जल पितरों को प्राप्त होता है उससे तृप्त होकर वह पूरे साल जहां भी रहते हैं सुख पाते हैं। और प्रसन्न होकर अपने वंश की वृद्धि और उन्नति का आशीर्वाद देते हैं।
जिनके परिवार में लोग पितरों को अन्न जल और पिंडदान नहीं देते हैं उनके पितर जल और अन्न के बिना व्याकुल होकर तड़पते हैं और क्रोधित होकर अपने ही वंशजों को शाप देते हैं जिससे वंश की वृद्धि में कठिनाई आती है और घर परिवार में कई तरह की परेशानियां आने लगती हैं।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान हर व्यक्ति को सात्विक रहना चाहिए। और द्वार पर आए किसी पशु, जीव और व्यक्ति का अनादर नहीं करे और अन्न एवं जल प्रदान करे। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि पितृगण पितृपक्ष के दौरान किसी भी रूप में अपने परिवार के लोगों के बीच आते हैं और अनादर होने पर दुखी और अनादर होकर चले जाते हैं। इसलिए पितृ पक्ष में पंच बलि का भी नियम है कि जिस तिथि पर माता अथवा पिता की मृत्यु हुई हो उस तिथि पर भोजन बनाकर एक भाग कुत्ते, बिल्ली, गाय, कौआ तथा चींटी को देना चाहिए।
पितृ पक्ष में श्राद्ध का नियम
पितृ पक्ष कुल 15 दिनों का होता है। इसमें पूर्णिमा तिथि को देव और ऋषियों का जल एवं फल से तर्पण किया जाता है। इसके बाद प्रतिपदा से अमावस्या तक हर दिन पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जाता है और तिल एवं जल दिया जाता है। इसके साथ ही अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर उनका श्राद्ध तर्पण करके ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से पितृगण जिस भी लोक में होते हैं वह सुख आनंद पाते हैं।




















